
भक्ति की दुनिया में कुछ पद ऐसे होते हैं, जिन्हें केवल कविता नहीं कहा जा सकता। उनमें शब्दों से अधिक भाव, प्रतिभा से अधिक कृपा और रचना से अधिक ठाकुरजी की प्रेरणा दिखाई देती है।
अष्टछाप के दो रसिक कवि—श्रीसूरदासजी और श्रीकृष्णदासजी—के बीच एक दिन कीर्तन-रचना को लेकर एक अनोखी होड़ हुई। प्रसंगवश सूरदासजी ने कृष्णदासजी के पदों में अपने ही पदों की झलक देखी और उनसे प्रश्न किया—
“आपकी अपनी मौलिकता क्या है?”
सूरदासजी का यह प्रश्न कृष्णदासजी के हृदय में गहराई तक उतर गया। उन्होंने निश्चय किया कि अगले दिन वे ऐसा पद सुनाएँगे, जो सूरदासजी ने पहले कभी न सुना हो और न रचा हो।
रात्रि बीतने लगी। कृष्णदासजी चिंतन करते रहे। मन में अनेक भाव उठे, लेकिन कोई ऐसा नवीन भाव नहीं सूझा जिसे वे अपने प्रभु के सामने अर्पित कर सकें।
और फिर...
भक्त की लाज रखने वाले ठाकुरजी ने अपनी कृपा का अद्भुत परिचय दिया।
प्रातः जब कृष्णदासजी जागे, तो उनके सिरहाने एक अनूठा पद लिखा हुआ मिला। उस पद में ब्रज से लौटते हुए कान्हा के मनोहर स्वरूप का ऐसा हृदयस्पर्शी चित्रण था, जिसमें गोपबालकों के संग लौटते श्रीकृष्ण, उनके चरणों से उड़ती ब्रज की पावन रज और उस रज से अलकों तक आई अनुपम छटा का अत्यंत सुंदर वर्णन था।
जब कृष्णदासजी ने वह पद सूरदासजी को सुनाया, तो सूरदासजी समझ गए कि यह केवल कृष्णदासजी की काव्य-प्रतिभा का परिणाम नहीं है।
इसके पीछे तो स्वयं ठाकुरजी की कृपा और प्रेरणा बोल रही थी।
यही तो भक्ति की सबसे सुंदर अनुभूति है—जब भक्त अपने सामर्थ्य से आगे बढ़कर कुछ कहता है और लगता है कि शब्द उसके नहीं, उसके आराध्य के हैं।
रसिक वैष्णवों के लिए इस प्रसंग में एक सुंदर प्रश्न छिपा है।
श्रीनाथजी की कृपा से श्रीकृष्णदासजी को प्राप्त हुए उस अनूठे पद का आरंभ किन शब्दों से होता है?
एक संकेत भी है—
पहली पंक्ति में कान्हा, गोपबालक, ब्रज की रज और एक विशेष गाय का सुंदर उल्लेख आता है।
यदि आपको पूरा पद स्मरण नहीं है, तो कोई बात नहीं।
जितना स्मरण हो, उतना ही लिखिए।
और यदि पद की पंक्ति याद नहीं, तो उस विशेष गाय का नाम भी लिख सकते हैं।
क्या पता, किसी एक वैष्णव की स्मृति से दूसरे वैष्णव को पूरा पद स्मरण हो जाए।
क्या यह—
भक्त की लाज रखने वाले ठाकुरजी की कृपा है?
भक्त की प्रतिभा के पीछे प्रभु की प्रेरणा है?
कृष्णदासजी और श्रीनाथजी के अंतरंग संबंध की कोई विशेष झलक है?
या फिर इस लीला में आपको कुछ और ही भाव दिखाई देता है?
अपने हृदय का भाव शब्दों में अवश्य लिखिए |
क्योंकि लीला का रस केवल उसे जानने में नही, बल्कि अपने भाव से उसे अनुभव करने में है।
जय श्रीनाथजी।
जय श्रीकृष्ण।