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जिसके सिर पर हाथ रखता, वो भस्म हो जाता था! फिर खुद ही कैसे भस्म हुआ भस्मासुर ? Mohini Avatar

जिसके सिर पर हाथ रखता, वो भस्म हो जाता था! फिर खुद ही कैसे भस्म हुआ भस्मासुर ? Mohini Avatar

जिसके सिर पर हाथ रखता, वो भस्म हो जाता था! फिर खुद ही कैसे भस्म हुआ भस्मासुर ? Mohini Avatar

जिस महादैत्य की एक छुअन से पूरा ब्रह्मांड जलकर राख हो सकता था, और जिसके भय से स्वयं देवाधिदेव महादेव तीनों लोकों में भागते फिर रहे थे... अंततः वह किसी अस्त्र, सुदर्शन चक्र या त्रिशूल से नहीं, बल्कि एक नर्तकी की पायल की झंकार और अपनी ही उंगलियों से कैसे भस्म हो गया?

 

प्राचीन काल में शकुनि नामक दैत्य का पुत्र था वृकासुर। वह जन्म से ही क्रूर, तामसी और महत्वाकांक्षी था। उसके मन में तीनों लोकों पर एकछत्र राज करने की तीव्र लालसा थी।

एक दिन उसने देवर्षि नारद को मार्ग में रोक लिया और धृष्टता से पूछा:हे ब्रह्मपुत्र! मुझे शीघ्र फल देने वाले देव के बारे में बताइए। ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन त्रिदेवों में से वह कौन है जो सबसे जल्दी प्रसन्न होता है और जिसे आसानी से अपने वश में किया जा सकता है?त्रिकालदर्शी देवर्षि नारद दैत्य के कुटिल स्वभाव को समझ गए। उन्होंने एक क्षण चिंतन किया और कहा:

 

दैत्यराज! भगवान आशुतोष (शिव) की आराधना करो। वे आशु-तोष हैं—अत्यंत अल्प सेवा से शीघ्र द्रवित हो जाते हैं। वे गुण-दोष नहीं देखते; जो कोई भी हठपूर्वक उनका ध्यान करता है, वे उसे मनचाहा वरदान सौंप देते हैं। उनके समान सुलभ कोई अन्य देव नहीं है।"

नारद जी का संकेत पाते ही वृकासुर के भीतर आसुरी अहंकार भड़क उठा। उसने मन ही मन निश्चय किया कि वह भोलेनाथ से ही अमरत्व जैसी अमोघ शक्ति छीनकर रहेगा।

 

वृकासुर हिमालय के दुर्गम, बर्फीले केदार-तीर्थ में पहुँचा। वहाँ उसने भूमि खोदकर एक विशाल अग्निकुंड स्थापित किया।

उसने किसी मंत्र या विधि-विधान की परवाह नहीं की; उसने सीधे अपने शरीर का ही सौदा करना शुरू किया:

प्रथम दिन: उसने अपने जांघ का मांस काटकर अग्नि में आहुति दी।

द्वितीय दिन: अपनी बांहों का मांस होम कर दिया।

तृतीय से छठे दिन: वह प्रतिदिन अपने शरीर के विभिन्न अंगों से रक्त-मांस काटकर "ॐ नमः शिवाय" की ध्वनि के साथ हवन में झोंकता रहा। उसका पूरा शरीर लहूलुहान और क्षत-विक्षत हो चुका था सातवें दिन जब कोई दैवीय वाणी या संकेत नहीं मिला, तो उसका तामसी हठ चरम पर पहुँच गया। उसने पवित्र मंदाकिनी के जल में स्नान किया, अपने गीले बालों को बांधा और अपनी तीक्ष्ण तलवार निकालकर अपनी गर्दन (सिर) पर रख ली जैसे ही उसने अपना मस्तक काटकर अग्नि में फेंकने के लिए तलवार खींची, उसी क्षण यज्ञकुंड की लपटों के बीच से साक्षात देवाधिदेव महादेव प्रकट हो गए!

 

महादेव ने अपने दोनों दिव्य हाथों से वृकासुर की तलवार पकड़ ली। उनके केवल स्पर्श मात्र से दैत्य के शरीर के सारे घाव भर गए, उसकी कटी हुई त्वचा फिर से सुवर्ण जैसी कांतिमान हो गई।

भगवान शिव ने करुणा भरे स्वर में कहा:वत्स वृकासुर! बस करो। मैं केवल जल और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाता हूँ, तुम्हें अपने शरीर को इस प्रकार यातना देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मांगो, तुम्हारा क्या अभीष्ट है? मैं तुम्हें इच्छित वर देने आया हूँ।

 

वृकासुर के भीतर छुपी आसुरी प्रवृत्ति बाहर आ गई। उसने घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथ जोड़े, परंतु उसकी आँखों में विनाश की ज्वाला धधक रही थी। उसने कहा:हे उमापति! यदि आप मुझ पर सचमुच प्रसन्न हैं, तो मुझे यह अद्वितीय वरदान दीजिए कि मैं जिस किसी भी सजीव या निर्जीव प्राणी के सिर पर अपना दाहिना हाथ रख दूँ—चाहे वह देव हो, दानव हो, मनुष्य हो या पशु—वह उसी क्षण जलकर भस्म (राख का ढेर) हो जाए भगवान शिव आशुतोष हैं, शरणागत के प्रति उदार हैं। यद्यपि वे जानते थे कि यह वरदान सृष्टि के संतुलन के विरुद्ध है, फिर भी अपने भक्त के हठ और अपने दिए वचन की मर्यादा रखते हुए उन्होंने अपनी दाहिनी हथेली उठाई और कह दिया:तथास्तु! (ऐसा ही होगा।)वरदान प्राप्त होते ही उस दैत्य का नाम पूरे ब्रह्मांड में 'भस्मासुर' के रूप में विख्यात हो गया।

 

वरदान की पुष्टि होते ही भस्मासुर के चेहरे पर एक कुटिल, अट्टहास भरी मुस्कान फैल गई। उसने सोचा:इस वरदान का परीक्षण करने के लिए साधारण मनुष्यों को क्या मारना? क्यों न सबसे पहले इसे स्वयं शिव पर ही आजमाया जाए? यदि शिव ही भस्म हो गए, तो न कोई संहारक बचेगा और न ही कोई मुझसे शक्तिशाली रहेगा। संपूर्ण कैलाश और सुंदरी पार्वती पर मेरा अधिकार होगा भस्मासुर ने अपनी लाल-पीली आँखें तरेरीं और अपनी भारी, वरदानी दाहिनी हथेली उठाकर सीधे महादेव के सिर की ओर झपटा!

 

भगवान शिव ने उसकी आँखों में हवस और विश्वासघात का नग्न रूप देख लिया। अपनी ही मर्यादा और वरदान के विधान के कारण वे उस पर तुरंत त्रिशूल का प्रहार नहीं कर सकते थे, क्योंकि वह वरदान उन्होंने स्वयं अपने मुख से दिया था।महादेव वहाँ से अंतर्धान हो गए।

 

वे उत्तर दिशा में कैलाश की बर्फीली चोटियों पर दौड़े—भस्मासुर पीछे-पीछे दौड़ता रहा वे पाताल के नागलोक में उतरे—भस्मासुर वहाँ भी हाथ उठाए पहुंच गया वे देवराज इंद्र के अमरावती नगर में गए—देवता भयभीत होकर अपने द्वार बंद करने लगे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। जिस महादेव के क्रोध से काल भी कांपता है, वे आज अपनी ही दी हुई शक्ति के आगे भाग रहे थे और उनके पीछे एक उन्मत्त दैत्य हाथ उठाए दौड़ रहा था अंततः महादेव क्षीरसागर की ओर गए, जहाँ भगवान श्रीमन नारायण शेषनाग पर शयन कर रहे थे। महादेव ने पुकार लगाई: हे जनार्दन! इस संकट से सृष्टि की रक्षा कीजिए!

 

भगवान विष्णु स्थिति की गंभीरता को पलक झपकते ही समझ गए। वे जानते थे कि भस्मासुर को किसी बल, बाण या सुदर्शन चक्र से नहीं जीता जा सकता, क्योंकि उसके हाथ की एक छुअन सब कुछ भस्म कर सकती थी। उसे केवल उसी की अपनी बुद्धि और हवस के जाल में फंसाकर ही मारा जा सकता था ​भगवान विष्णु ने तुरंत अपनी योगमाया से 'मोहिनी' का अत्यंत मनोहारी, दिव्य और अद्वितीय रूप धारण किया ​उधर, भस्मासुर हाँफता हुआ एक हरे-भरे, सुरम्य वन के मार्ग से गुजर रहा था। तभी उसकी कानों में हवा की सरसराहट के बीच घुंघरुओं की अत्यंत मीठी रुनझुन और कंगन की खनक सुनाई दी।

 

​उसने ठिठककर देखा। सामने एक अशोक वृक्ष की शाखा का सहारा लिए एक ऐसी स्त्री खड़ी थी, जिसके सौंदर्य की तुलना में स्वर्ग की अप्सराएँ भी फीकी पड़ जाएँ:​उसके केश बादलों की तरह घने और काले थे​ उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें हिरणी के समान चंचल थीं।​उसके अधरों पर एक मादक, मंद मुस्कान थी ​वह अपने हाथों में एक लाल रंग की कंदुक (गेंद) लेकर हवा में उछालते हुए खेल रही थी ​उस मोहिनी रूप को देखते ही भस्मासुर के पैरों की गति थम गई। उसका शरीर जड़वत हो गया। वह भूल गया कि वह शिव के पीछे दौड़ रहा था; वह भूल गया कि वह तीनों लोकों का अधिपति बनने निकला था ​उसके भीतर की आसुरी वासना ने उसके संपूर्ण विवेक को लील लिया। उसकी जीभ सूख गई और वह सम्मोहित होकर मोहिनी की ओर डग भरने लगा।

 

भस्मासुर ने अपने भयानक चेहरे को विनम्र बनाने का प्रयास करते हुए हाथ जोड़े और गद्गद कंठ से बोला:

 

"हे कल्याणी! तुम इस निर्जन वन में अकेली क्या कर रही हो? तुम कौन हो? मैं तीनों लोकों का सबसे शक्तिशाली पुरुष भस्मासुर हूँ। साक्षात शिव भी मेरे भय से छिपते फिर रहे हैं। तुम मेरी पटरानी बन जाओ, मैं तीनों लोकों का ऐश्वर्य तुम्हारे चरणों में डाल दूँगा।"

मोहिनी ने अपनी तिरछी भौंहें मटकाईं, खिलखिलाकर हँसी और उपेक्षा भरे स्वर में कहा:अरे दैत्यराज! तुम पुरुषों की बातों का क्या भरोसा? तुम आज मीठी बातें करते हो, और कल किसी दूसरी के पीछे भागते हो। और फिर, मैं कोई साधारण दासी नहीं हूँ। मैं तो गंधर्व-कन्या हूँ—एक नर्तकी!

 

मेरा यह प्रण है कि जो पुरुष नाट्यशास्त्र की हर एक मुद्रा में मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर ठीक वैसा ही नृत्य कर सके जैसा मैं करती हूँ, मैं केवल उसी को अपना पति स्वीकार करूँगी। क्या तुम जैसा स्थूल और भयानक असुर मेरे समान कोमल और शास्त्रीय नृत्य कर सकता है? यदि नहीं, तो अपना मार्ग नापो कामुकता के वशीभूत भस्मासुर का अहंकार पुनः जाग उठा। उसने छाती ठोककर कहा:

हे सुंदरी! तुम मुझे कम मत समझो। तुम जैसा नाचोगी, मैं ठीक वैसा ही नाचकर दिखाऊँगा। यदि तुमने मुझे पराजित कर दिया तो मैं तुम्हारा दास बनूँगा, और यदि मैंने तुम्हारी हर मुद्रा की नकल कर दी, तो तुम्हें इसी क्षण मुझसे गांधर्व विवाह करना होगा मोहिनी ने मुस्कराकर स्वीकृति दे दी: तथास्तु! तो फिर ताल मिलाओ।

 

उपवन के शांत वातावरण में मोहिनी ने अपने पैरों में घुंघरू बांधे और नृत्य प्रारंभ किया। मोहिनी के साथ-साथ भस्मासुर भी अपनी भारी देह को हिलाने लगा शुरुआत में मोहिनी ने सरल मुद्राएँ बनाईं:

मोहिनी ने दाहिना चरण आगे बढ़ाया—भस्मासुर ने भी अपना दाहिना पैर आगे रखा मोहिनी ने अपनी कटि (कमर) पर बायां हाथ टिकाया—भस्मासुर ने तुरंत अपनी कमर पर हाथ रख लिया मोहिनी ने आकाश की ओर दोनों भुजाएं उठाकर लहराईं—भस्मासुर ने भी मदमस्त होकर अपनी बांहें हवा में लहरा दीं।

 

जैसे-जैसे समय बीता, मोहिनी के घुंघरुओं की गति तीव्र होने लगी। ताल द्रुत (तेज) होती गई। भस्मासुर मोहिनी के नयनों के जादू, उसके चेहरे के हाव-भाव और नृत्य के सम्मोहन में इस कदर डूब चुका था कि उसका बाहरी संसार से संपर्क पूरी तरह कट गया। उसे केवल मोहिनी के अंग-संचालन दिखाई दे रहे थे अचानक, संगीत की सबसे तीव्र और चरम थाप (सम) आई मोहिनी ने एक अलौकिक चक्कर (घूमर) लिया, अपनी आँखों को भस्मासुर की आँखों में गड़ाया, और अत्यंत सहज भाव से अपनी दाहिनी हथेली को ऊपर उठाया और सीधे अपने स्वयं के मस्तक (सिर) पर रख लिया!

भस्मासुर की चेतना शून्य हो चुकी थी। वह केवल एक शीशे की तरह मोहिनी के हर कदम की नकल कर रहा था। बिना एक पल का भी विचार किए, बिना यह याद रखे कि उसके दाहिने हाथ में महादेव का कौन-सा प्रलयंकारी वरदान छिपा है—

 

भस्मासुर ने भी उसी क्षण अपना वही वरदानी दाहिना हाथ उठाया और पूरे वेग से अपने ही मस्तक पर रख दिया!

 

हथेली का सिर से स्पर्श होते ही ब्रह्मांड में सन्नाटा छा गया।

अगले ही क्षण, भस्मासुर के मस्तक से एक भयानक, नीले-लाल रंग की प्रलयंकारी ज्वाला भभक उठी! उसके शरीर की नसों में आग दौड़ गई दैत्य की आँखों से आग की लपटें निकलने लगीं। उसके मुख से एक गगनभेदी, दर्दनाक चीत्कार निकली:

"त्राहि माम्! मैं जल रहा हूँ!परंतु अब कोई बचाने वाला नहीं था। जिस शक्ति से वह दूसरों को राख करना चाहता था, उसी शक्ति ने पलक झपकते ही उसकी हड्डियों, मांस और अहंकार को भीतर से जलाकर भस्म कर दिया कुछ ही सेकंडों के भीतर, वह महाबलशाली भस्मासुर ज़मीन पर गिरकर केवल एक मुट्ठी सफेद राख (भस्म) का ढेर बनकर बिखर गया।

 

!! जय श्री #कृष्णा!!

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